हे केशव तुम आओ

हे केशव तुम आओ, पुकार रही पांचाली उसकी लाज बचाओ।

हर घर में दुःशासन बैठा, अपने बल और घमंड में ऐंठा।

उसको सबक सिखाओ, हे केशव तुम आओ।

चीर हरण जब हुआ द्रोपदी का तुम आये, साड़ी को उनकी अक्षय बनाये।

महाभारत में बिना शस्त्र उठाये, अर्जुन को विजय बनाये।

अब कलियुग में सहस्त्रों द्रोपदी की लाज बचाओ, हे केशव तुम आओ।

वृंदावन में बांसुरी बजाए, राधा के संग मानव मात्र को प्रेम सिखाये।

गोपियों के संग रास रचाये, अब रास नहीं अब सुदर्शन उठाओ,

हे केशव तुम आओ।

पुकार रही संसार की नारी- पुरुषों की गन्दी सोच की मारी।

गुहार लगा कर सभी हैं हारी, गीता में दिए वचन को निभाओ,

हे केशव तुम आओ, अपना वचन निभाओ।

 

 

कवि गौरव कुमार, रुदौली, बेगूसराय